ना जाने क्या?

ना जाने क्या सोचता रहता है
मुझसे तो कुछ कहता नहीं
उसकी नम आँखें और शांत सा चेहरा देख कर
दिल मेरा टूट सा जाता है

ना जानें किन चीज़ों से गुज़रता है रोज़
मुझसे अपने दुःख बांटता नहीं
उसकी तकलीफें महसूस कर
मेरा मन भर सा जाता है

ना जाने कितने तूफ़ान लिए बैठा है
अपने तनहा मन के अंदर
उसकी उफानों की चीख पहुँच जाती है मुझ तक
भले वो कुछ जताता नहीं

दिल करता है उसको थाम लून
कहूँ उस से कि मैं हूँ
मन चाहता है कि उसको ये एहसास दिलाऊं
कि वो अकेला नहीं

ना जाने क्या सोचता रहता है
मुझसे तो कुछ कहता नहीं
न जाने क्या चलता रहता उसके दिलोदिमाग में
मुझसे अपने दुःख बांटता नहीं

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