हादसों के सिलसिलों का नाम ही तो ज़िन्दगी है
टूटती हूँ बिखरती हूँ
फिर ख़ुद को समेटती हूँ
जब तक हैं सांसें जी लूँ, कुछ कर लूँ
खुश रहे जो लोग हैं, इतनी सी तुझसे बंदगी है

ऐ ख़ुदा! तूने जो दिया उसके लिए मुझपर क़र्ज़ है तेरा
जो ना दिया, वो भी ठीक है
तेरी इबादत ही मर्ज़ है मेरा
सोचती हूँ कभी कभी
कि आख़िर क्यों जी रही हूँ
किस राह पर जाना था और किस रस्ते चल रही हूँ

फिर ख़ुद को समझाने को तेरा वास्ता देती हूँ
कि ऐ यशी! रब पर भरोसा रख
आगे कुछ नया होगा
जो बीत गया सो बीत गया
किसे पता कल क्या होगा

शायद अपने माँ बाप को खुश करने में ही जीवन है
उनकी हँसी और ठहाकों में
मैं अपनी मुस्कान ढून्ढ लुंगी
रही बात उलझनों कि
तो जरिया मेरे पास है
लेकर कलम और कागज़ कोरा
मन को कहीं उतार लुंगी

हादसों के सिलसिलों का नाम ही तो ज़िन्दगी है
हादसों के सिलसिलों का नाम ही तो ज़िन्दगी है

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